Monday, 24 November 2025

★ *उस “एक” को मत भूलो !* ★ *आज तुम जिस कुर्सी पर बैठ कर*, राजगद्दी का मान पा रहे हो, आज़ादी की हवा में रहकर, सम्मान का सुख पा रहे हो— सोचो, यह सब क्यों सम्भव है? *उसके पीछे किसी “एक” का त्याग है*, किसी “एक” का संघर्ष है भारी, जिसने अपना समय, श्रम, समर्पण देकर, सपनों की नींव तुम्हें सौंप दी सारी। *पर आज वही “एक” ओझल है*, नज़र से दूर, चर्चा से परे— सही नहीं है उसे भूल जाना, जिसने राह दिखाई तुम्हें चलने की। वह कुर्सी, वह अधिकार, वह सम्मान, यूँ ही नहीं तुम्हारे पास आया— *यह रेडक्रॉस सोसायटी के लोकतंत्र का फल है*, जिसे एक सेवक ने अपनी निष्ठा से सजाया। वह सेवक, वह संघर्षकर्ता, जिसका नाम प्रकाश-स्तम्भ जैसा— *वही एक—सीए दिनेश सनाढ्य*, जिसने कर्तव्य को बनाया जीवन-लेखा। *मत भूलो उस एक की मेहनत*, मत अनदेखा करो उसका योगदान— जिसने बिना चाहत, बिना अपेक्षा, तुम्हें सौंपा सेवा-सम्मान का स्थान। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* *#एक हिन्दुस्तानी* (77) 24/11/25 #dineshapna


 

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