Saturday, 25 October 2025

★ *“अधिकार माँग कर या छिन कर”* ★ *माँग कर जो अधिकार मिले*, वह दया का दान कहलाए, देने वाला जब खुश हो, तभी तुम्हें कुछ पाय। उसकी मर्जी, उसकी रज़ा, उसी पे सब कुछ टिका, ऐसे अधिकारों की डोर सदा, रहती औरों के हाथों बंधा। पर *जब अधिकार छिन कर लो*, तो हक़ तुम्हारा कहलाए, कर्म, साहस, सत्य का संग, तब न्याय स्वयं मुस्काए। ना भीख, ना दया, ना डर किसी का बोझ उठाए, जो अपना है, वह लेकर ही, आत्मगौरव जगाए। *माँगने वाला झुकता सिर, पाने की आशा में*, *छीनने वाला खड़ा अडिग, सत्य की भाषा में*। एक दया का पात्र बने, दूसरा सम्मान का अधिकारी, माँग में गुलामी की रेखा, छिनने में स्वतंत्रता सारी। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* *#एक हिन्दुस्तानी* (67) 26/10/25 #dineshapna



 

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