Sunday, 1 November 2026

■ *राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच* ■ (की पर्यावरण पर webinr on 91/11/26 व 83 व्यक्ति ) *राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच के राजस्थान प्रदेश महासचिव के रूप में* हमारा यह चिंतन समाज और प्रशासन दोनों के लिए दिशा-प्रदर्शक है। इसके लिए *निम्न बिंदुओं का विश्लेषणात्मक विवरण और समाधान नीचे प्रस्तुत है:-* *(1.) सरकारी तंत्र, कानून, बजट और खर्च के बावजूद अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं?* सरकारी स्तर पर पर्याप्त बजट, कानून (जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल एवं वायु प्रदूषण निवारण अधिनियम) और विभाग होने के बावजूद धरातल पर *अपेक्षित परिणाम न मिलने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:-* ● *कार्यान्वयन और अनुपालन (Implementation & Compliance) में भारी कमी:* कानून बहुत मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कड़ाई से पालन कराने वाली एजेंसियों में इच्छाशक्ति, संसाधनों और पारदर्शिता का अभाव रहता है। ● *भ्रष्टाचार और मिलीभगत:* उद्योगों और प्रशासनिक निगरानी तंत्र के बीच सांठगांठ के कारण प्रदूषण मानकों (जैसे ETP/STP संचालन) का उल्लंघन होता है, और कागजों पर सब कुछ ठीक दिखा दिया जाता है। ● *योजनाओं में जन-भागीदारी का अभाव:* सरकारी योजनाएं अक्सर 'टॉप-डाउन' (ऊपर से थोपी गई) होती हैं। स्थानीय नागरिकों, किसानों और समुदायों को जोड़े बिना योजनाएं केवल सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। ● *लक्ष्यों का संख्यात्मक (Quantitative) होना, गुणात्मक (Qualitative) नहीं:* बजट का उपयोग केवल पौधे लगाने, सेमिनार करने या आंकड़े दिखाने तक सीमित रह जाता है; वास्तव में पौधों के जीवित रहने की दर (Survival Rate) या जल स्रोतों की शुद्धता पर कोई दीर्घकालिक मॉनिटरिंग नहीं होती। ● *उत्तरदायित्व (Accountability) का स्पष्ट न होना:* विफलता की स्थिति में किसी भी विभाग या अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का ठोस तंत्र नहीं है। *(2.) गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs), सामाजिक संगठनों और अन्य संस्थाओं के प्रयासों के बावजूद अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं?* स्वयंसेवी संस्थाओं और अन्य संगठनों द्वारा किए जा रहे सराहनीय प्रयासों के बावजूद *मनचाहा परिणाम न मिलने के कारण इस प्रकार हैं:-* ● *संसाधनों और निरंतरता की कमी:* कई संगठन शुरुआती उत्साह में अभियान शुरू करते हैं, लेकिन वित्तीय संसाधनों, फंडिग की अनिश्चितता और निरंतरता (Consistency) के अभाव में वे बीच में ही दम तोड़ देते हैं। ● *खंडित (Fragmented) प्रयास:* विभिन्न संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर छिटपुट काम करती हैं। एक साझा रणनीति या समन्वय (Coordination) न होने के कारण प्रयासों का सामूहिक प्रभाव (Collective Impact) दिखाई नहीं देता। ● *केवल जागरूकता तक सीमित रहना:* अधिकांश संस्थाएं रैलियों, बैठकों और सम्मेलनों (Awareness Creation) तक सीमित रहती हैं; वे नीतिगत पैरवी (Policy Advocacy), कानूनी हस्तक्षेप और वैज्ञानिक समाधानों तक नहीं पहुंच पातीं। ● *स्थानीय समुदाय से जुड़ाव की कमी:* कई बार बाहरी संस्थाएं स्थानीय जनता की वास्तविक जरूरतों और प्राथमिकताओं को समझे बिना अपने एजेंडे पर काम करती हैं, जिससे जनता का जुड़ाव नहीं बन पाता। *(3.) उक्त दोनों समस्याओं का समग्र समाधान क्या है?* ● *कड़ी जवाबदेही और सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit):* सरकारी हो या गैर-सरकारी, हर खर्च और परियोजना का सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य होना चाहिए, जिसमें स्थानीय आम जनता की सीधी भागीदारी हो। ● *'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays Principle) का कड़ाई से पालन:* पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों पर भारी आर्थिक दंड और त्वरित न्यायिक कार्रवाई हो, ताकि कानून का डर कायम रहे। ● *सामूहिक सहभागिता (Public-Private-People Partnership):* सरकार, उद्योग, और नागरिक समाज (Civil Society) को मिलाकर एक 'त्रि-स्तरीय समन्वय समिति' बने जो पारदर्शी तरीके से काम करे। ● *सतत निगरानी (Continuous Monitoring) और तकनीक का उपयोग:* ड्रोन मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से वनों की कटाई, अवैध खनन और प्रदूषण के स्तर पर रियल-टाइम नजर रखी जाए। *(4.) 'राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच' को क्या करना चाहिए?* ■■ (कार्य-योजना) ■■ राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच (NEMCF) के राजस्थान प्रदेश महासचिव के रूप में, आप इस दिशा में एक मिसाल कायम कर सकते हैं। *मंच को निम्नलिखित ठोस कदम उठाने चाहिए:-* (I) *जमीनी स्तर पर 'पर्यावरण प्रहरी' और 'खनिज रक्षक' नेटवर्क का गठन* ● प्रदेश के हर जिले, तहसील और गांव में स्थानीय युवाओं, किसानों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जोड़कर एक स्वयंसेवी 'पर्यावरण वाहिनी' का गठन किया जाए, जो अवैध खनन, जल स्रोतों के अतिक्रमण और प्रदूषण की जमीनी रिपोर्ट सीधे मंच तक पहुंचाए। (II) *नीतिगत पैरवी और विधिक हस्तक्षेप (Policy Advocacy & Legal Action)* ● केवल ज्ञापन देने के बजाय, पर्यावरण और खनिज कानूनों के क्रियान्वयन में कमियों को उजागर करने के लिए जनहित याचिका (PIL) या विधिक मंचों का प्रभावी उपयोग किया जाए। ● खनन क्षेत्रों (Mining Belts) में पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं (EMP) के पालन की स्वतंत्र रूप से समीक्षा रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी जाए। (III) *'ग्राम स्वराज और पर्यावरण' अभियान (Panchayati Raj Integration)* ● अपने पिछले अनुभवों और 'पंचायती राज की पाठशाला' जैसे सफल मॉडलों का उपयोग करते हुए, पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायतों) को पर्यावरण और जल संरक्षण के अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक और सशक्त किया जाए। (IV) *वैज्ञानिक और व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करना (Demonstration Projects)* ● किसी एक अंचल (जैसे राजसमंद या आसपास के क्षेत्र) को चुनकर वहां 'आदर्श जल संरक्षण' या 'वृक्षारोपण उत्तरदायित्व मॉडल' (जहां पौधे लगाने वाले को ही उसकी देखरेख का जिम्मा और प्रोत्साहन मिले) विकसित किया जाए, ताकि सरकार और समाज दोनों के सामने एक सफल उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके। (V) *पारदर्शी सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) की शुरुआत* ● खनिज क्षेत्र से मिलने वाले 'जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट' (DMFT - District Mineral Foundation Trust) फंड के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जनता के बीच जाकर इसके सामाजिक अंकेक्षण की पहल की जाए, ताकि यह पैसा सही मायनों में पर्यावरण और प्रभावित क्षेत्रों के विकास में लगे। निवेदक: *CA दिनेश चन्द्र सनाढ्य* महासचिव - राजस्थान प्रदेश, राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज सरक्षण मंच • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (351) #एक_हिन्दुस्तानी #01/11/2026 #dineshapna


 

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