Sunday, 1 November 2026

■ *राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच* ■ (की पर्यावरण पर webinr on 91/11/26 व 83 व्यक्ति ) *राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच के राजस्थान प्रदेश महासचिव के रूप में* हमारा यह चिंतन समाज और प्रशासन दोनों के लिए दिशा-प्रदर्शक है। इसके लिए *निम्न बिंदुओं का विश्लेषणात्मक विवरण और समाधान नीचे प्रस्तुत है:-* *(1.) सरकारी तंत्र, कानून, बजट और खर्च के बावजूद अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं?* सरकारी स्तर पर पर्याप्त बजट, कानून (जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल एवं वायु प्रदूषण निवारण अधिनियम) और विभाग होने के बावजूद धरातल पर *अपेक्षित परिणाम न मिलने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:-* ● *कार्यान्वयन और अनुपालन (Implementation & Compliance) में भारी कमी:* कानून बहुत मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कड़ाई से पालन कराने वाली एजेंसियों में इच्छाशक्ति, संसाधनों और पारदर्शिता का अभाव रहता है। ● *भ्रष्टाचार और मिलीभगत:* उद्योगों और प्रशासनिक निगरानी तंत्र के बीच सांठगांठ के कारण प्रदूषण मानकों (जैसे ETP/STP संचालन) का उल्लंघन होता है, और कागजों पर सब कुछ ठीक दिखा दिया जाता है। ● *योजनाओं में जन-भागीदारी का अभाव:* सरकारी योजनाएं अक्सर 'टॉप-डाउन' (ऊपर से थोपी गई) होती हैं। स्थानीय नागरिकों, किसानों और समुदायों को जोड़े बिना योजनाएं केवल सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। ● *लक्ष्यों का संख्यात्मक (Quantitative) होना, गुणात्मक (Qualitative) नहीं:* बजट का उपयोग केवल पौधे लगाने, सेमिनार करने या आंकड़े दिखाने तक सीमित रह जाता है; वास्तव में पौधों के जीवित रहने की दर (Survival Rate) या जल स्रोतों की शुद्धता पर कोई दीर्घकालिक मॉनिटरिंग नहीं होती। ● *उत्तरदायित्व (Accountability) का स्पष्ट न होना:* विफलता की स्थिति में किसी भी विभाग या अधिकारी की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने का ठोस तंत्र नहीं है। *(2.) गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs), सामाजिक संगठनों और अन्य संस्थाओं के प्रयासों के बावजूद अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं?* स्वयंसेवी संस्थाओं और अन्य संगठनों द्वारा किए जा रहे सराहनीय प्रयासों के बावजूद *मनचाहा परिणाम न मिलने के कारण इस प्रकार हैं:-* ● *संसाधनों और निरंतरता की कमी:* कई संगठन शुरुआती उत्साह में अभियान शुरू करते हैं, लेकिन वित्तीय संसाधनों, फंडिग की अनिश्चितता और निरंतरता (Consistency) के अभाव में वे बीच में ही दम तोड़ देते हैं। ● *खंडित (Fragmented) प्रयास:* विभिन्न संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर छिटपुट काम करती हैं। एक साझा रणनीति या समन्वय (Coordination) न होने के कारण प्रयासों का सामूहिक प्रभाव (Collective Impact) दिखाई नहीं देता। ● *केवल जागरूकता तक सीमित रहना:* अधिकांश संस्थाएं रैलियों, बैठकों और सम्मेलनों (Awareness Creation) तक सीमित रहती हैं; वे नीतिगत पैरवी (Policy Advocacy), कानूनी हस्तक्षेप और वैज्ञानिक समाधानों तक नहीं पहुंच पातीं। ● *स्थानीय समुदाय से जुड़ाव की कमी:* कई बार बाहरी संस्थाएं स्थानीय जनता की वास्तविक जरूरतों और प्राथमिकताओं को समझे बिना अपने एजेंडे पर काम करती हैं, जिससे जनता का जुड़ाव नहीं बन पाता। *(3.) उक्त दोनों समस्याओं का समग्र समाधान क्या है?* ● *कड़ी जवाबदेही और सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit):* सरकारी हो या गैर-सरकारी, हर खर्च और परियोजना का सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य होना चाहिए, जिसमें स्थानीय आम जनता की सीधी भागीदारी हो। ● *'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays Principle) का कड़ाई से पालन:* पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों पर भारी आर्थिक दंड और त्वरित न्यायिक कार्रवाई हो, ताकि कानून का डर कायम रहे। ● *सामूहिक सहभागिता (Public-Private-People Partnership):* सरकार, उद्योग, और नागरिक समाज (Civil Society) को मिलाकर एक 'त्रि-स्तरीय समन्वय समिति' बने जो पारदर्शी तरीके से काम करे। ● *सतत निगरानी (Continuous Monitoring) और तकनीक का उपयोग:* ड्रोन मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से वनों की कटाई, अवैध खनन और प्रदूषण के स्तर पर रियल-टाइम नजर रखी जाए। *(4.) 'राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच' को क्या करना चाहिए?* ■■ (कार्य-योजना) ■■ राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज संरक्षण मंच (NEMCF) के राजस्थान प्रदेश महासचिव के रूप में, आप इस दिशा में एक मिसाल कायम कर सकते हैं। *मंच को निम्नलिखित ठोस कदम उठाने चाहिए:-* (I) *जमीनी स्तर पर 'पर्यावरण प्रहरी' और 'खनिज रक्षक' नेटवर्क का गठन* ● प्रदेश के हर जिले, तहसील और गांव में स्थानीय युवाओं, किसानों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों को जोड़कर एक स्वयंसेवी 'पर्यावरण वाहिनी' का गठन किया जाए, जो अवैध खनन, जल स्रोतों के अतिक्रमण और प्रदूषण की जमीनी रिपोर्ट सीधे मंच तक पहुंचाए। (II) *नीतिगत पैरवी और विधिक हस्तक्षेप (Policy Advocacy & Legal Action)* ● केवल ज्ञापन देने के बजाय, पर्यावरण और खनिज कानूनों के क्रियान्वयन में कमियों को उजागर करने के लिए जनहित याचिका (PIL) या विधिक मंचों का प्रभावी उपयोग किया जाए। ● खनन क्षेत्रों (Mining Belts) में पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं (EMP) के पालन की स्वतंत्र रूप से समीक्षा रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी जाए। (III) *'ग्राम स्वराज और पर्यावरण' अभियान (Panchayati Raj Integration)* ● अपने पिछले अनुभवों और 'पंचायती राज की पाठशाला' जैसे सफल मॉडलों का उपयोग करते हुए, पंचायती राज संस्थाओं (ग्राम पंचायतों) को पर्यावरण और जल संरक्षण के अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक और सशक्त किया जाए। (IV) *वैज्ञानिक और व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करना (Demonstration Projects)* ● किसी एक अंचल (जैसे राजसमंद या आसपास के क्षेत्र) को चुनकर वहां 'आदर्श जल संरक्षण' या 'वृक्षारोपण उत्तरदायित्व मॉडल' (जहां पौधे लगाने वाले को ही उसकी देखरेख का जिम्मा और प्रोत्साहन मिले) विकसित किया जाए, ताकि सरकार और समाज दोनों के सामने एक सफल उदाहरण प्रस्तुत किया जा सके। (V) *पारदर्शी सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) की शुरुआत* ● खनिज क्षेत्र से मिलने वाले 'जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट' (DMFT - District Mineral Foundation Trust) फंड के उपयोग की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जनता के बीच जाकर इसके सामाजिक अंकेक्षण की पहल की जाए, ताकि यह पैसा सही मायनों में पर्यावरण और प्रभावित क्षेत्रों के विकास में लगे। निवेदक: *CA दिनेश चन्द्र सनाढ्य* महासचिव - राजस्थान प्रदेश, राष्ट्रीय पर्यावरण एवं खनिज सरक्षण मंच • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (351) #एक_हिन्दुस्तानी #01/11/2026 #dineshapna


 

■ *सीए पेशे की आत्मा - 'Money with Morals'* ■ ICAI की आचार संहिता चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को केवल लाभ कमाने या बैलेंस शीट मिलाने तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह सिखाती है कि धन का सृजन और प्रबंधन हमेशा उच्च नैतिक मूल्यों (Integrity & Ethics) के दायरे में होना चाहिए। यह व्यवसाय और धन के साथ सदाचार का अनूठा संतुलन पेश करती है। *ICAI में आचार संहिता के मुख्य बिंदु :-* *(1) कब लागू हुई :-* पहली बार वर्ष 1963 में जारी की गई, जिसे समय-समय पर वैश्विक मानकों (IFAC) और CA Act, 1949 के तहत अद्यतन किया जाता है। *(2) क्यों लागू की गई :-* ● वित्तीय पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए। ● हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने हेतु। ● पेशेवर ईमानदारी, निष्पक्षता और कदाचार (Misconduct) पर लगाम लगाने के लिए। *(3) किसे फायदा है :-* ● निवेशकों और आम जनता को (सुरक्षित निवेश)। ● कंपनियों और व्यापारिक घरानों को (मजबूत साख)। ● स्वयं चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को (सामाजिक प्रतिष्ठा)। *(4) देश को फायदा :-* ● कॉर्पोरेट घोटालों पर रोक, मजबूत अर्थव्यवस्था। ● विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि। *(5) अन्य प्रोफेशन (डॉक्टर/वकील) से श्रेष्ठता के कारण :-* ● वैधानिक नियंत्रण: CA Act, 1949 के तहत संसद द्वारा संचालित और उल्लंघन पर सदस्यता रद्द करने तक के कड़े कानूनी प्रावधान। ● प्राथमिकता (जनहित बनाम क्लाइंट): वकील अपने मुवक्किल और डॉक्टर मरीज के प्रति समर्पित होते हैं, जबकि CA का प्राथमिक कर्तव्य 'पब्लिक इंटरेस्ट' (जनता, बैंक और सरकार के भरोसे) के प्रति होता है। ● स्वतंत्रता के कड़े मानदंड: हितों के टकराव से बचने के लिए बेहद सख्त 'इंडिपेंडेंस' नियम। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (350) #एक_हिन्दुस्तानी #31/10/2026 #dineshapna


 

Saturday, 31 October 2026

■ *'आचार संहिता' (Code of Ethics)* ■ आदरणीय अध्यक्ष महोदय, सम्मानित मंच और मेरे सभी प्रबुद्ध सहकर्मियों, आज हम एक ऐसे अत्यंत *महत्वपूर्ण और पवित्र विषय पर चर्चा* करने के लिए एकत्रित हुए हैं, *जो हमारे पूरे पेशे और संगठन की रीढ़ है*—इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया *(ICAI) द्वारा निर्धारित 'आचार संहिता' (Code of Ethics)* और साथ ही *हमारी ICAI राजसमंद ब्रांच के विजन को दिशा देने वाले मूल्य।* एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) केवल बही-खातों का मिलान करने वाला पेशेवर नहीं होता, बल्कि वह *देश की आर्थिक व्यवस्था का प्रहरी और जनता के वित्तीय विश्वास का संरक्षक* होता है। आइए, इस अवसर पर हम *राष्ट्रीय स्तर पर ICAI की आचार संहिता और राजसमंद ब्रांच के विशिष्ट मार्गदर्शन* —दोनों के समन्वय पर दृष्टि डालें: *भाग 1:* *ICAI की आचार संहिता के मूल स्तंभ* ● *1. सत्यनिष्ठा (Integrity) और निष्पक्षता:* आचार संहिता का सबसे पहला और अनिवार्य नियम है सत्यनिष्ठा। एक पेशेवर के रूप में हमारा यह दायित्व है कि हम अपने सभी व्यावसायिक और वित्तीय संबंधों में पूर्णतः सच्चे, ईमानदार और पारदर्शी रहें। किसी भी प्रकार का दबाव या प्रलोभन हमारी निष्पक्षता (Objectivity) को डिगा नहीं सकता। ● *2. व्यावसायिक सक्षमता और उचित सावधानी (Professional Competence & Due Care):* कानून, कर प्रणालियाँ, लेखा मानक और व्यावसायिक तकनीकें निरंतर बदल रही हैं। ICAI की आचार संहिता हमें निरंतर सीखने का कर्तव्य याद दिलाती है, ताकि हम अपने मुवक्किलों और संस्थाओं को सर्वश्रेष्ठ और त्रुटिहीन सेवा दे सकें। ● *3. गोपनीयता (Confidentiality):* एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के पास किसी भी व्यवसाय की सबसे संवेदनशील वित्तीय जानकारियाँ होती हैं। आचार संहिता सिखाती है कि बिना उचित कानूनी अधिकार के क्लाइंट की गोपनीय जानकारी साझा न की जाए; यही विश्वास हमारे पेशे की असली पूंजी है। *●*4. उच्च व्यावसायिक आचरण (Professional Behavior):* कानून के दायरे में रहकर कार्य करना और देश के नियमों का पालन करना हर सीए का कर्तव्य है। हमें ऐसी किसी भी गतिविधि से बचना चाहिए जिससे हमारे पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचे। *भाग 2:* *राजसमंद ब्रांच के विजन और 'टिंट' (T.I.N.T.) का संदेश* साथियों, राष्ट्रीय आचार संहिता के इन *उच्च मूल्यों को जमीन पर उतारने और अपनी संस्था को गति* देने के लिए, ICAI की *राजसमंद ब्रांच के प्रथम निर्वाचित चेयरमैन, सीए दिनेश सनाढ्य का संदेश* हम सभी को एक अत्यंत प्रेरक और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह संदेश इस बात को उजागर करता है कि कैसे *"T.I.N.T." (टिंट) यानी सूक्ष्म परिवर्तन* के सिद्धांतों को अपनाकर संगठन को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है। इस 'टिंट' (T.I.N.T.) के चार महत्वपूर्ण आयाम हैं: ● *1. T for Together Work & Grow (सामूहिक कार्य और विकास):* सभी सदस्य मिलकर कार्य करें और एक-दूसरे का संबल बनकर आगे बढ़ें। ● *2. I for Integrity & Equality (नैतिकता और समानता):* संगठन में सभी के साथ समान सम्मान और पूर्ण ईमानदारी से व्यवहार किया जाए। ● *3. N for New Ideas & Concepts (नए विचार और अवधारणाएं):* कार्यप्रणाली में नवीन दृष्टिकोण और आधुनिक विचारों को अपनाया जाए। ● *4. T for Transparency & Honesty (पारदर्शिता और ईमानदारी):* प्रशासनिक निर्णयों और कार्यों में पूरी स्पष्टता और सत्यनिष्ठा बनाए रखी जाए। *यह दृष्टिकोण नेतृत्व, सामूहिक प्रयास और पारदर्शिता को बढ़ावा देने का एक अनूठा उदाहरण है।* *संकल्प का आह्वान* साथियों, ICAI की आचार संहिता और राजसमंद ब्रांच का यह 'टिंट' (T.I.N.T.) *संदेश केवल नियमों या शब्दों की किताबें नहीं हैं, बल्कि यह हमारे अंतःकरण की आवाज* हैं। आइए, आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने *दैनिक व्यावसायिक जीवन में इन नैतिक मूल्यों का पूर्ण पालन करेंगे,* अपनी ब्रांच और *देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएंगे और जनता के विश्वास को* हमेशा सर्वोपरि रखेंगे। आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! जय हिंद, जय भारत! ★जयश्रीकृष्ण★ *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (349) #एक_हिन्दुस्तानी #31/10/2026 #dineshapna



 

Friday, 30 October 2026

■ *सरपंच चुनाव से देश के चुनाव तक* ■ (भ्रष्टाचार: जड़, तंत्र और हमारा संकल्प) देश के विकास और लोकतंत्र के मार्ग में भ्रष्टाचार (Corruption) सबसे बड़ा नासूर बन चुका है। यह कोई ऊपरी बीमारी नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें हमारी व्यवस्था के सबसे निचले स्तर से लेकर सबसे ऊंचे पायदान तक गहरी फैली हुई हैं। *(1.) भ्रष्टाचार की धुरी और इसकी शुरुआत* ■ *प्रारंभिक बिंदु (ग्राम स्तर):* इस पूरी श्रृंखला की शुरुआत सरपंच (गाँव की संसद) के चुनाव से होने वाले अत्यधिक खर्च से होती है। इस गलत शुरुआत को सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आम जनता की मौन सहमति भी मिल जाती है। ■ *संरक्षण और मिलीभगत:* इस व्यवस्था को समय के साथ प्रशासन, चुनाव आयोग, विधायकों (राज्य की संसद), सांसदों (देश की संसद) और न्यायपालिका का अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष सहयोग मिलता रहता है। ■ *भ्रष्टाचार की सीढ़ी:* सरपंच लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई होने के साथ-साथ भ्रष्टाचार की पहली सीढ़ी है। यहीं से सीखकर व्यक्ति आगे चलकर विधायक और सांसद के स्तर पर बड़े भ्रष्टाचार का रास्ता तय करता है। *(2.) ठोस और प्रभावी समाधान* इस व्यवस्था को बदलने के लिए केवल भाषणों की नहीं, बल्कि जन-जागरूकता और कठोर सामूहिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। (1) *पहला समाधान:* जन-जागरूकता और नैतिक शुद्धि ■ *प्रलोभन का पूर्ण बहिष्कार:* आम जनता को यह दृढ़ संकल्प लेना होगा कि वे चुनाव के दौरान किसी भी प्रकार के धन, उपहार या प्रलोभन को स्वीकार बिलकुल नहीं करेंगे। ■ *तंत्र की जवाबदेही:* इसके साथ ही, प्रशासन, चुनाव आयोग, जनप्रतिनिधियों (विधायक-सांसद) और न्यायपालिका को अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से निभाते हुए 100% सहयोग करना होगा, ताकि भ्रष्टाचार के हर रास्ते को शुरुआत में ही बंद किया जा सके। (2) *दूसरा समाधान:* ग्राम सभा की शक्ति और सोशल ऑडिट (Social Audit) ■ *गाँव की एकजुटता:* आम जनता को अपनी ग्राम सभा में एकजुट होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ ढाल बनना होगा। ■ *वित्तीय नियंत्रण:* जब गाँव स्तर पर नियमित सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण) होगा, तो गलत तरीकों और भारी-भरकम चुनाव खर्च से जीतने वाला व्यक्ति अपने धन का दुरुपयोग वसूल नहीं कर पाएगा। ■ *दूरगामी परिणाम:* जब चुनाव जीतने का यह 'व्यापारिक मॉडल' असफल हो जाएगा, तो कोई भी प्रत्याशी भविष्य में गलत चुनाव खर्च करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। ●●●● *निष्कर्ष:* ●●●● बदलाव की शुरुआत नीचे से ही होगी। जब ग्राम स्तर पर जनता जागरूक और अडिग होगी, तभी देश से भ्रष्टाचार की इस गहरी जड़ को उखाड़ फेंका जा सकता है। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (348) #एक_हिन्दुस्तानी #30/10/2026 #dineshapna


 

Thursday, 29 October 2026

■ *क्या यह सरपंच चुनाव का कड़वा सच है?* ■ कि जहाँ एक तरफ सरपंच का मासिक मानदेय कुछ हजार रुपये ही होता है, वहीं दूसरी तरफ चुनावों में प्रत्याशी पानी की तरह पैसा बहा देते हैं। इसके पीछे का पूरा गणित सामाजिक रसूख, चुनावी राजनीति और उसके बाद की वसूली से जुड़ा हुआ है। *(1.) प्रत्याशी चुनाव में लाखों-करोड़ों रुपये क्यों खर्च करते हैं?* भले ही कागजों में निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव खर्च की सीमा तय (जैसे राजस्थान में सरपंच पद के लिए यह सीमा ₹1 लाख है), लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट होती है। *इसके प्रमुख कारण* निम्नलिखित हैं:- ■ *सामाजिक प्रतिष्ठा और रसूख (Ego & Prestige):* ग्रामीण क्षेत्रों में 'सरपंच' सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि बहुत बड़ी शान और रुतबे की चीज़ मानी जाती है। लोग अपने गांव में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते हैं। ■ *राजनीतिक सीढ़ी (Stepping Stone to State Politics):* कई लोग भविष्य में विधायक, सांसद या जिला प्रमुख बनने की पहली सीढ़ी के रूप में सरपंच के चुनाव को देखते हैं। वे क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भारी निवेश करते हैं। ■ *मतदाताओं का ध्रुवीकरण और लुभावने वादे:* आजकल ग्रामीण चुनावों में भी शहरी स्तर की चुनावी संस्कृति घुस चुकी है। मतदाताओं को रिझाने के लिए पार्टियां या उम्मीदवार वोट के बदले नकद, शराब, पार्टियां आयोजित करना, वाहन और डीजल का खर्च, और सामुदायिक भोज पर अंधाधुंध पैसा खर्च करते हैं। ■ *प्रतिस्पर्धा (Tough Competition):* जब एक उम्मीदवार पैसा खर्च करना शुरू करता है, तो मुकाबले में टिके रहने के लिए दूसरे उम्मीदवार को भी मजबूरी में या अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उससे ज्यादा खर्च करना पड़ता है। *(2.) प्रत्याशी इस खर्चे को वापस कैसे वसूल करते हैं?* जब कोई व्यक्ति चुनाव में अपनी जमा-पूंजी या कर्ज लेकर लाखों रुपये लगाता है, तो वह इसे एक 'व्यापारिक निवेश' की तरह देखता है। चुनाव जीतने के बाद इस पैसे को निकालने के *मुख्य तरीके* निम्नलिखित हैं: ■ *सरकारी विकास कार्यों में कमीशन (Kickbacks/Commissions):* ग्राम पंचायत को केंद्र और राज्य सरकार से विकास कार्यों (जैसे- सीसी सड़कें, नालियां, नलकूप, चारदीवारी, स्ट्रीट लाइट आदि) के लिए लाखों-करोड़ों रुपये का बजट मिलता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा ठेकेदारी, निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल करवाकर या फर्जी बिल (MBook/Measurement Book में हेरफेर) पास करवाकर कमीशन के रूप में वापस निकाला जाता है। ■ *मनरेगा (MGNREGA) और योजनाओं में गड़बड़ी:* मनरेगा के तहत होने वाले कामों, जॉब कार्ड धारकों की फर्जी हाजिरी या मशीनों से होने वाले काम को मजदूरों से होना दिखाकर सरकारी फंड का एक हिस्सा अपने आदमियों के जरिए निकाला जाता है। ■ *भ्रष्टाचार और एनओसी (NOC) के नाम पर वसूली:* गांव में किसी का मकान बनना हो, दुकान का लाइसेंस चाहिए, सरकारी योजना का लाभ दिलाना हो, पट्टा बनवाना हो या अन्य प्रशासनिक कार्य हों, तो कई बार लोग अपने काम जल्दी करवाने के लिए अनौपचारिक रूप से पैसे देने को मजबूर होते हैं। ■ *भूमि और खनन से जुड़े विवादों का निपटारा:* गांव की जमीन के बंटवारे, रास्तों के विवाद या अवैध कब्जे/खनन मामलों में पंचायत स्तर पर समझौते और पंचायती के नाम पर भी भारी मात्रा में अवैध वसूली की जाती है। ●●●● *निष्कर्ष* ●●●● चूंकि इस *पूरे चक्र में पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश होती है,* इसलिए चुनाव में किया गया यह 'अवैध खर्चा' कुछ ही महीनों या सालों में कई गुना होकर वापस वसूल लिया जाता है। *यही कारण है कि जनता द्वारा चुने जाने वाले जनप्रतिनिधि सेवा भाव से ज्यादा व्यावसायिक फायदे के रूप में इस पद को देखने लगते हैं।* *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (347) #एक_हिन्दुस्तानी #30/10/2026 #dineshapna


 

■ *करवा चौथ की शुभकामनाएं !* ■ निर्जला यह साधना सिखाए, प्रेम का सच्चा समर्पण, साथी के सुख और हित में, कर दिया जीवन ये अर्पण। भूख-प्यास की बंदिशों से, सीखें हम संयम और धीर, हर कठिन परिस्थिति में भी, बंधी रहे मन की ये पीर। छान ले छलनी कमियाँ सारी, बस अच्छाई ही दर्शाए, दोष भूलकर केवल गुण को, दिल का नाता अपनाए। करवा मिट्टी का सिखलाए, सरल और निर्मल आधार, अहंकार को दूर भगाकर, जीवन में भर ले मनुहार। चंदा जैसी सौम्य शीतलता, घर-आँगन में शांति लाए, समान आदर और समझ से, दांपत्य सदा मुस्काए। बंधे रहें विश्वास की डोरी, रहे हृदय का संतुलन, करवा चौथ की यह पावन सीख, महका दे सारा जीवन। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (346) #एक_हिन्दुस्तानी #29/10/2026 #dineshapna


 

Wednesday, 28 October 2026

■ *युगों के साथ बदलते धर्म और युद्ध के सिद्धांत* ■ ( काल चक्र के साथ धर्म का पतन और युद्ध जीतने के तौर-तरीके आदर्शवाद से व्यावहारिक यथार्थ की ओर बढ़ते चले गए। ) *(1) सत्ययुग में* धर्म अपने पूरे स्वरूप में यानी *चारों चरणों पर* प्रतिष्ठित था। उस काल में छल-कपट का कोई स्थान नहीं था; युद्ध केवल तपोबल, सत्य और आध्यात्मिक तेज से जीते जाते थे, जहाँ शारीरिक बल से अधिक महत्व आत्मबल का था। *(2) त्रेतायुग में* धर्म घटकर *तीन चरणों पर* रह गया और व्यवस्था की रक्षा के लिए मर्यादा का महत्व बढ़ा। इस युग में श्रीराम ने कठोर युद्ध-नियमों और नैतिकता के भीतर रहकर विजय प्राप्त की। यहाँ जीत का आधार अधर्म का मुकाबला धर्म और आचार संहिता का पालन करते हुए करना था। *(3) द्वापरयुग में* यहाँ तक आते-आते धर्म केवल *दो चरणों पर* सिमट गया और अधर्म अत्यंत संगठित हो गया। ऐसे में केवल नियमों में बंधे रहने से धर्म की रक्षा असंभव थी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कूटनीति और व्यावहारिक धर्म की राह दिखाई, जहाँ उच्चतर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के पारंपरिक नियमों को गौण मानकर रणनीति से विजय हासिल की गई। *(4) कलयुग में* धर्म केवल *एक चरण पर* टिका है और युद्ध किसी बाहरी मैदान के बजाय मनुष्य के भीतर मानसिक और वैचारिक स्तर पर लड़ा जा रहा है। यहाँ न कोई निश्चित नियम हैं और न कोई स्पष्ट सीमा। इस युग में वही व्यक्ति विजयी है जो प्रलोभन, क्रोध और भ्रम से परे रहकर आत्म-नियंत्रण, बुद्धि और विवेक से अपने आंतरिक द्वंद्व को जीतता है। संक्षेप में ---- *जीत का आधार सत्ययुग में तप, त्रेता में मर्यादा, द्वापर में कूटनीति और कलयुग में आत्म-विवेक रहा है।* *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (345) #एक_हिन्दुस्तानी #28/10/2026 #dineshapna