Chartered Accountant,Social Activist,Political Analysist-AAP,Spritual Thinker,Founder of Life Management, From India, Since 1987.
Friday, 14 October 2022
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही सभी धर्मो के हित मे है ! हिन्दू राष्ट्र मे बाधक कौन ? क्यों ? व कैसे बाधाओं को हटाया जाये ? (१)"नेता" सबसे बड़ी बाधा है क्योंकि भारत मे सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र था किन्तु आक्रांताओं ने हिन्दुओं को ही तलवार / धन के बल पर हिन्दू राष्ट्र बनने मे बाधा उत्पन्न की ! किन्तु नेताओं ने वोट के खातिर बाधाएं उत्पन्न की ! (२)"हिन्दू धर्म के दीमक" ही सबसे बड़ी बाधा है जो हिन्दू होकर अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण हिन्दू राष्ट्र बनाने का विरोध कर रहे है या धर्मनिरपेक्षता की अनावश्यक बातें कर रहे है ! (३)सच्चाई को समझे - कि यदि कोई वर्षों पुराने हमारे मकान मे किराए पर आये या जबरदस्ती कब्जा कर ले या हमारे भाईयों को बल/धन/छल से अपने पक्ष मे कर ले, तो भी वह हमारे घर का कानूनी रुप से मालिक नहीं बन सकता है ! उसी प्रकार की हमारे भारत की स्थिति है ! (४)हमें केवल भ्रमित किया जा रहा है और कानूनी दाँव पेच उलझाने का प्रयास किया जा रहा है ! कोर्ट को केवल गुमराह करके समय बबार्द किया जा रहा है ! (५)राजनीति के दोनों पक्ष / विपक्ष को एकजुट होने व हिन्दुओं व पिछले कुछ वर्षों से बने हिन्दुओं को मिलकर एक स्वर मे हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहिए ! सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #(211) #13/10/22 #dineshapna
Thursday, 13 October 2022
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही सभी धर्मो के हित मे है ! हिन्दू राष्ट्र मे बाधक कौन ? क्यों ? व कैसे बाधाओं को हटाया जाये ? (१)"नेता" सबसे बड़ी बाधा है क्योंकि भारत मे सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र था किन्तु आक्रांताओं ने हिन्दुओं को ही तलवार / धन के बल पर हिन्दू राष्ट्र बनने मे बाधा उत्पन्न की ! किन्तु नेताओं ने वोट के खातिर बाधाएं उत्पन्न की ! (२)"हिन्दू धर्म के दीमक" ही सबसे बड़ी बाधा है जो हिन्दू होकर अपने तुच्छ स्वार्थ के कारण हिन्दू राष्ट्र बनाने का विरोध कर रहे है या धर्मनिरपेक्षता की अनावश्यक बातें कर रहे है ! (३)सच्चाई को समझे - कि यदि कोई वर्षों पुराने हमारे मकान मे किराए पर आये या जबरदस्ती कब्जा कर ले या हमारे भाईयों को बल/धन/छल से अपने पक्ष मे कर ले, तो भी वह हमारे घर का कानूनी रुप से मालिक नहीं बन सकता है ! उसी प्रकार की हमारे भारत की स्थिति है ! (४)हमें केवल भ्रमित किया जा रहा है और कानूनी दाँव पेच उलझाने का प्रयास किया जा रहा है ! कोर्ट को केवल गुमराह करके समय बबार्द किया जा रहा है ! (५)राजनीति के दोनों पक्ष / विपक्ष को एकजुट होने व हिन्दुओं व पिछले कुछ वर्षों से बने हिन्दुओं को मिलकर एक स्वर मे हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहिए ! सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #(211) #13/10/22 #dineshapna
Wednesday, 12 October 2022
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही सभी धर्मो के हित मे है ! (१) हिन्दुस्तान न तो "संविधान" से और न ही "धर्म" से चल रहा है ! हकीकत मे हिन्दुस्तान "नेताओं की मनमर्जी" से चल रहा है ! (२) नेता न तो "संविधान" को मानते है, क्योंकि वोट के खातिर कई कानून संविधान विरुद्ध बना रखे है उदाहरण - 30 हिन्दू विरोधी काले कानून व अल्पसंख्यको के लिए बने कानून ! आरक्षण का भी दुरुपयोग वोट के लिए कर रहे है ! (३)नेता न तो धर्म मानते है, केवल दिखाने के लिए धर्म का नाटक करते है, धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने का काम वोट के लिए करते है ! (४)नेताओं व वोट के कारण संविधान / कानून को तोड़ा / मरोड़ा जा रहा है और जनता को मूर्ख बनाया जा रहा है ! (५)नेताओं की दुकानदारी / दुरुपयोग रोकने के लिए हिन्दुस्तान मे पूर्व की स्थिति कायम करने के लिए धर्म को अपनाना होगा, इसके लिए हमें "हिन्दू राष्ट्र" बनाना होगा ! सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #(210) #12/10/22 #dineshapna
Monday, 10 October 2022
रामकथा - कलि महिमा - नवपरायण★★रामकथा 29/09/2022★★ ★★कलयुग की महिमा★★ श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कलि महिमा का वर्णन :- (१) कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ । ॥97 क॥ भावार्थ:-कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए । ॥97 (क)॥ (२) भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म । ॥97 ख॥ भावार्थ:-सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया। हे ज्ञान के भंडार! हे श्री हरि के वाहन! सुनिए, अब मैं कलि के कुछ धर्म कहता हूँ । ॥97 (ख)॥ (३) बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी। द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन। ॥1॥ भावार्थ:-कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता । ॥1॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 30/09/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (२) ★★ श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में कलि महिमा का वर्णन :- (४) सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥ जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना । ॥3॥ भावार्थ:-जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है । ॥3॥ (५) निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला । ॥4॥ भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है । ॥4॥ (६) जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ । ॥98 ख॥ भावार्थ:-जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं । ॥98 (ख)॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 01/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (३) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (७)नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥ लघु जीवन संबदु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥2॥ भावार्थ:-मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥2॥ (८)धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी॥ नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो॥4॥ भावार्थ:-धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं॥4॥ (९)कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी॥ कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै॥5॥ भावार्थ:-कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं॥5॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 02/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (४) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (१०) नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट मर्कट की नाईं॥ सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेल जनेऊ लेहिं कुदाना॥1॥ भावार्थ:-हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं॥1॥ (११) सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी॥ गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी॥2॥ भावार्थ:-सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं॥2॥ (१२) सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना॥ गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा॥3॥ भावार्थ:-सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं। शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है)॥3॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 03/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (५) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (१३) कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥ नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥3॥ भावार्थ:-कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥3॥ (१४) इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता॥ सब लोग बियोग बिसोक हए। बरनाश्रम धर्म अचार गए॥4॥ भावार्थ:-ईर्षा (डाह), कड़वे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए॥4॥ (१५) दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी॥ तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे॥5॥ भावार्थ:-इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत् में वे ही फैले हैं॥5॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 04/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (६) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (१६)ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं॥ बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी॥4॥ भावार्थ:-वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं॥4॥ (१७)सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना॥ सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा॥5॥। भावार्थ:-शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता॥5॥ (१८)भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग॥100 क॥ भावार्थ:-कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं॥100 (क)॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 05/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (७) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (१९)सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड॥101 क॥ भावार्थ:-हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)॥101 (क)॥ (२०)तामस धर्म करिहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनी बए न जामहिं धान॥101 ख॥ भावार्थ:-मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं॥101 (ख)॥ (२१) नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं॥ लघु जीवन संबदु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा॥2॥ भावार्थ:-मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा॥2॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 06/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (८) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (२२)कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥ त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥1॥ भावार्थ:-सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥1॥ (२३)द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥2॥ भावार्थ:-द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥2॥ (२४)कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥ सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥3॥ भावार्थ:-कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥3॥ ------------------------------------- ★★रामकथा 07/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (९) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (२५)सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥ जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥3॥ भावार्थ:-जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥3॥ (२६)निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥4॥ भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥4॥ (२७)जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥98 ख॥ भावार्थ:-जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥98 (ख)॥ ------------------------------------- श्रीरामचरितमानस मे कलि महिमा के "नव परायण" का विश्राम ! इति ! ------------------------------------- सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #07/10/22 #dineshapna
भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही सभी धर्मो के हित मे है ! (१) हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इस धर्म मे ही अन्य किसी भी धर्म को समाहित करने की शक्ति है ! (२) किसी अन्य धर्म मे अन्य दूसरे धर्म को समाहित करने की शक्ति नहीं है ! (३) भारत का संविधान "धर्मनिरपेक्ष" है, तो भी राजनैतिक दलों ने "हिन्दू विरोधी 30 काले कानून" बना रखें है ! (४) इसलिए किसी भी राजनैतिक दलों / नेताओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता है ! (५) आम आदमी ने 75 वर्षों से "धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र" को देख लिया है, तो अब क्यों नहीं 5 वर्ष के लिए "हिन्दू राष्ट्र" बना के देखना चाहिए ? सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #(209) #10/10/22 #dineshapna
Friday, 7 October 2022
★★रामकथा 07/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (९) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (२५)सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥ जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना॥3॥ भावार्थ:-जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है॥3॥ (२६)निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला॥4॥ भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है॥4॥ (२७)जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ॥98 ख॥ भावार्थ:-जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं॥98 (ख)॥ श्रीरामचरितमानस मे कलि महिमा के "नव परायण" का विश्राम ! इति ! सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी (208) #07/10/22 #dineshapna
Thursday, 6 October 2022
★★रामकथा 06/10/2022★★ ★★कलयुग की महिमा (८) ★★ श्रीरामचरितमानस में कलि महिमा का वर्णन :- (२२)कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी॥ त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं॥1॥ भावार्थ:-सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं॥1॥ (२३)द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा॥ कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा॥2॥ भावार्थ:-द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं॥2॥ (२४)कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥ सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥3॥ भावार्थ:-कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है,॥3॥ सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी #(207) #06/10/22 #dineshapna
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