Monday, 21 December 2020

★★ क्या फोरलेन की कमियाँ नोटिस व पैनल्टी लगाने से पूरी हो जायेगी ! ★★ (1)फोरलेन की कमियों के लिए जनता ने 5 वर्षों मे कई पत्र लिखे, जिस आधार पर कमियाँ दूर करना तो दूर, पत्रो का जवाब भी नहीं दिया ! (2)फोरलेन की कमियों के कारण कई दुघर्टना होने के साथ सैकडो जाने गई ! ◆आम जनता फोरलेन के लिए पैसा देती है ! ◆इसके बावजूद असुविधा व असुरक्षा मिलती है ! ◆न सरकार सुनती है और न प्रशासन सुनता है ! ◆नोटिस व पैनल्टी केवल दिखावा मात्र है ! सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी 21/12/2020 #dineshapna ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● ★★ राजसमन्द फोरलेन की सच्चाई ★★ ★★ 2016 से राजसमन्द की लडाई ★★ ◆◆>>>>>चार साल का सफर>>>>>>◆◆ (1) गोमती उदयपुर फोरलेन - संघर्ष का क्रम 【09/02/2016 to 04/10/2020】 (2) कांग्रेस - बीजेपी ने फोरलेन के नाम पर राजसमन्द की जनता को लूटा व 30 साल तक लूटने पर मजबूर किया ! (3) राजसमन्द फोरलेन - मौत की सड़क, लूट की सड़क ! (4) कांग्रेस - बीजेपी ने फोरलेन के नाम पर राजसमन्द की जनता को मूर्ख बनाया ! (5) आम आदमी पार्टी इस फोरलेन का "सामाजिक अंकेक्षण" कराकर "सुविधाजनक व टोल फ्री" करायेगी ! (6) नाममात्र के डिवाईडर से आँखों मे लाईट से रात्रि को परेशानी ! (7) बरसात मे फोरलेन पर जगह जगह पानी से वाहन चालकों को परेशानी ! (8) फोरलेन पर पानी निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से परेशानी ! (9) फोरलेन पर जगह जगह खड्डों से वाहन चालकों को परेशानी ! (10) फोरलेन पर परेशानी के साथ दुघर्टनाओं की हमेशा सम्भावना से मौत का डर ! (11) फोरलेन आरामदायक व सुविधाजनक सफर के स्थान पर परेशानी व मौत का सफर ! (12) पाँच साल से कई शिकायतों परन्तु कोई निराकरण नहीं ! (13) टोल टैक्स व पास के नाम पर अनियमितता व परेशानी ! (14) नाथूवास, नाथद्वारा की दयनीय व दर्दनाक स्थिति :-- (नाथूवास मे ●"दर्दनाक सड़क" से सीधी ●"मौत की फोरलेन" से जोडते हुए) (15) क्या दोनो पार्टियों मे ऐसी सड़क जनता को देने के बावजूद "चुनाव मे बेशर्मी से वोट माँगने" आने की हिम्मत है ? (16) क्या नाथूवास मे फोरलेन बनाते समय "मौत का चौराहा" बनाया गया ! उस समय प्रशासन व सरकार सो रहे थे ? या अपनी - अपनी जेब भरने मे लगे और जनता जाये भाड़ मे ? (17) इसी नाथूवास चौराहा को, इन नेताओं ने बेईमानी कर "मौत का फोरलेन" बनाया, और इसी जगह दिसम्बर, 2018 मे इन्हीं नेताओं की गाड़ीयो का एक्सीडेंट हुआ, तो भी इन्हें अक्ल नही आई ! (18) राजसमंद के कॉर्पोरेट (सदभाव) गोमती उदयपुर फोरलेन द्वारा विकास के नाम पर लूट ! (19) नियम व गुणवत्ता के अनुसार सड़क निर्माणनही ! (20) कर राजस्व व पर्यावरण (पेडो की कटाई)को नुकसान ! (21) जनता की पुरानी सड़क व जनता की जमीन का पूरा मुआवजा नही दिया ! (22) जनता की शिकायतों को न सुना व न ही समाधान किया ! (23) केवल मुनाफे के लिए जमीन व संसाधनों कादुरुपयोग, जनता को परेशान व जान जोखिम में डालकर टोल टैक्स के रूप में करोडो की लूट ! (24) जनता के 250 से 300 शिकायतों व ज्ञापनके बावजूद सरकार , कुछ नेताओ व कुछ अफसरों ने कॉर्पोरेट का पक्ष लिया तथा स्वयं व कॉर्पोरेट को फायदा पहुंचाया ! (25) जनता की जमीन छीनी, पर्यावरण बिगाड़ा,कर राजस्व की चोरी , जोख़िमभरी सड़क बनाई, जबरन टोलवसूली, जनता को कोई फायदा नही, तो भी जबरन टोल देना तथा जनता की कोई सुनवाही नही ! (26) आम जनता का धन व धरम दोनों गया ! सरकार व प्रशासन को कुछ फायदा ! कॉर्पोरेट को धन व अधिकार दोनों मिले ! (27) यह कॉर्पोरेट (एक - देशी) की 80 किमी सड़क का हाल है, तो सोचो ! जब इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में कॉर्पोरेट ( एक हजार - देशी व विदेशी) की 8000 किमी सड़क, रेल, फैक्ट्री, हवाई अड्डे, बन्दरगाह होगे ? (28) तब क्या सरकार उनपर नियंत्रण कर आमजनता का हित सुरक्षित कर पायेगी ? क्या जब आम जनता व देश कॉर्पोरेट (विदेशी व देशी ) का गुलाम नही होगा ? ◆हमारे कहने पर विश्वास न करें, आज 23/08/2020 का लाईव वीडियो देखे ! फेसबुक लाईव 23/08/2020 at 07.18 P.M. बडारडा, राजसमन्द व पीपरडा, राजसमन्द की स्थिति https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3566849433335031&id=100000300273580 CA. Dinesh Sanadhya = जिलाध्यक्ष - आम आदमी पार्टी, राजसमन्द - 12.10.2020 www.dineshapna.blogspot.in















 

Sunday, 20 December 2020

कृषि कानून को समझे व किसानों का हित सोचे ! कानून रद्द करने के बजाय आमूल परिवर्तन करें ! ! ■■■■■■ तीन कृषि बिल 2020 ■■■■■■ (1) - कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020 इसके मुताबिक किसान मनचाही जगह पर अपनी फसल बेच सकते हैं । बिना किसी रुकावट दूसरे राज्यों में भी फसल बेच और खरीद सकते हैं । इसका मतलब है कि एपीएमसी (APMC) के दायरे से बाहर भी फसलों की खरीद-बिक्री संभव है । साथ ही फसल की बिक्री पर कोई टैक्स नहीं लगेगा । ऑनलाइन बिक्री की भी अनुमति होगी. इससे किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे । (2) - मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 देशभर में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग को लेकर व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है । फसल खराब होने पर उसके नुकसान की भरपाई किसानों को नहीं बल्कि एग्रीमेंट करने वाले पक्ष या कंपनियों को करनी होगी । किसान कंपनियों को अपनी कीमत पर फसल बेचेंगे । इससे किसानों की आय बढ़ेगी और बिचौलिया राज खत्म होगा । (3) - आवश्यक वस्तु संशोधन बिल 2020 आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम को 1955 में बनाया गया था । अब खाद्य तेल, तिलहन, दाल, प्याज और आलू जैसे कृषि उत्‍पादों पर से स्टॉक लिमिट हटा दी गई है । बहुत जरूरी होने पर ही इन पर स्‍टॉक लिमिट लगाई जाएगी । ऐसी स्थितियों में राष्‍ट्रीय आपदा, सूखा जैसी अपरिहार्य स्थितियां शामिल हैं । प्रोसेसर या वैल्‍यू चेन पार्टिसिपेंट्स के लिए ऐसी कोई स्‍टॉक लिमिट लागू नहीं होगी । उत्पादन, स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन पर सरकारी नियंत्रण खत्म होगा । ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● ★★ किसानों को नुकसान व उसका बचाव ! ★★ ●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●● (1) - इन तीनो बिलो से किसानों को नुकसान होने की पूरी सम्भावना है क्योंकि व्यापार मे जो सक्षम होता है वह ज्यादा फायदा उठाता है । यहाँ किसान व कारपोरेट मे जो ज्यादा सक्षम होगा, उसे ही ज्यादा फायदा होगा । यहाँ कारपोरेट ही सक्षम है इसलिए किसानों को नुकसान होने की 100 % सम्भावना है ! (2) - आवश्यक वस्तु संशोधन बिल के कारण स्टाँक लिमिट हटाने व इस पर से सरकारी नियंत्रण हटाना । यह स्पष्ट करता है कि इसका 100 % फायदा केवल कारपोरेट को ही होगा व किसानों को दोनो हाथों से लूटा जायेगा । (3) - इन तीनों बिलो से ज्यादा जरूरी है कि किसानों को सभी पैदावार (अन्न, दालों, सब्जियों व फलों की न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP - Minimum Selling Price) निश्चित करें, जिससे किसानों को किसी भी स्थिति मे नुकसान न हो तथा उक्त MSP से नीचे की दर पर खरीदना कानूनी अपराध हो । जिससे कारपोरेट किसानों का शोषण नहीं कर सके । ■■■■■■■■ सुझाव ■■■■■■■■ ★★तीन कृषि बिल के स्थान पर तीन अक्षरों का केवल अर्थ बदले !★★ ★बीजेपी के तीन - तीन कृषि बिलो से किसानों की आय दुगनी नहीं होने वाली है, क्योंकि इसका फायदा सक्षम बड़े व्यापारी / कारपोरेट ही उठाने वाले है ! ★यदि MSP "मिनिमम सपोर्ट प्राईज" के स्थान पर, MSP "मिनिमम सेल्स प्राईज" सभी कृषि उत्पादों की सुनिश्चित कर दी जाये ! ★तो किसानों को पैदावार करने से पहले यह निश्चित हो जायेगा कि मुझे किसी भी स्थिति मे MSP तो मिलेगी ही, जिससे फायदा सुनिश्चित रहेगा ! ★इसके साथ ही यह कानून बना दिया जाये की MSP से कम खरीदने पर खरीदने वाले को तुरंत जेल ! ★यदि कोई किसान की फसल नहीं खरीदे तो सरकार 100% खरीद सुनिश्चित करें ! ■इन 'तीन अक्षरों" से किसानों की आय दुगनी के स्थान पर "आय तिगुनी" होगी ! ■"बिल" के स्थान पर "अक्षरों" का अर्थ बदले ! ◆◆◆◆◆ महत्वपूर्ण विचारणीय बिन्दु ◆◆◆◆◆◆ (1) संसद के पास किए हुए कानून से देश चलता है,,, (i) कानून अगर असंवैधानिक तरीके से बना है, तो हमारी न्यायपालिका को उसे रद्द करने का अधिकार है,,, (ii) कोई कानून अगर जनभावनाओं के विरूद्ध है तो सरकार उसमें संशोधन भी करती है,,, (iii) जनभावनाओं के विरूद्ध कानून बनाने पर जनता को 5 साल में सरकार बदलने का अधिकार है,,, और नई सरकार जनविरोधी कानून को रद्द कर सकती है,,,, जैसा कि, आपातकाल में जितने संविधान संशोधन और कानून स्व.इंदिरा ने बनाए थे,,, जनता पार्टी की सरकार ने रद्द कर दिया,,, (2) किन्तु यदि कानून को ही रद्द करेंगे तो दूरगामी गम्भीर परिणाम हो सकते है । आज किसान आंदोलन के नाम पर दस,बीस हजार लोग सड़कों को जाम कर, जिद्द किए हुए हैं,,, कानून को रद्द करो नहीं तो हम देश को ठप्प कर देंगे,,, अगर इस तरह के दबाव से कानून रद्द होने लगे तो ......... (i) कल 1 - 2 लाख लोग ओ,बी,सी और सामान्य वर्ग के लोग सड़कों पर उतर कर मांग करेंगे कि एस,सी,एसटी, एक्ट रद्द करो,,, (ii) कल 4 - 5 लाख लोग जम्मू-कश्मीर में लोग सड़कों को घेर कर बैठ जाएं और मांग करें कि धारा 370 बहाल करो,,, (iii) कल 10 - 20 लाख लोग सड़कों पर आ जाएं और मांग करें CAA कानून रद्द करों,,, (iv) कल 50 लाख लोग सड़कों पर आ जाएं और मांग करें,,,, जो वंदेमातरम् नहीं बोले,,, भारत मां की जय नहीं बोले,,, उनकी नागरिकता रद्द करों,,,तो सरकार को सभी की मांग माननी चाहिए,,,? (3) देश संवैधानिक व्यवस्था से चलेगा या सड़कों पर अव्यवस्था फैलाकर अराजकता उत्पन्न करने से नही,,,? सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी 20/12/2020 #dineshapna



 

Thursday, 17 December 2020

हिन्दू मन्दिरों को इस्लाम, ईसाई व नेताओं ने लूटा ! देवस्थान विभाग के बाद, भूमाफियाओं की लूट ! राजस्थान मे 1949 मे देवस्थान विभाग का गठन करके कई मन्दिरों का अधिग्रहण करके हजारों हेक्टेयर जमीन, भवन, आभूषण, सोना चाँदी व अन्य व्यवस्थाओं (प्रबन्ध व संचालन) को अपने हाथ मे लिया । किन्तु धन, स्टाफ व धार्मिक भावनाओं के अनुरूप प्रबन्धन की कमी के चलते मन्दिरो मे अव्यवस्था हो रही है व हजारों हेक्टेयर जमीन व भवनों पर भूमाफियाओं कि कब्जा हो रहा हैं । इतिहास के मुताबिक, भले ही औरंगजेब को मंदिरों का सबसे बड़ा दुश्मन माना गया हो, जिसने अपने शासन काल में सैकड़ों मंदिर तुड़वाए । परन्तु अब तो राजस्थान के अंदर ही एक ऐसा वर्ग पनप चुका है, जो भगवान को उन्हीं की जमीन से उखाड़कर विदा करने को तैयार है । यहां देवताओं को संकटमोचन नहीं मिल रहे. ऊपर से वे कानून के फेरे में फंसे जा रहे हैं. प्रदेश में 'प्रभु' स्थल से जुड़े सवा दो सौ मामले अदालतों में चल रहे हैं । एक तरफ दबंग कब्जाधारी तो दूसरी ओर तरफ लुंज-पुंज अंदाज में देवभूमियों की पैरवी करता देवस्थान महकमा, बीच मे रेंगती न्याय व्यवस्था । अब राजस्थान प्रदेश में देवताओं को विस्थापित होने से बचाने के लिए अदालत ही एकमात्र रास्ता हैं । 【1】मन्दिरों की जमीनों पर कब्जा :- सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों के तहत जो तथ्य मिले हैं, उससे तो एकदम उलटी तस्वीर प्रकट होती है । प्रदेश के पांच संभागों - ◆जयपुर, ◆अजमेर, ◆कोटा, ◆उदयपुर, ◆बीकानेर में देवस्थान विभाग के अधीन यही कोई 4,700 हेक्टेयर जमीन है । इसमें से एक तिहाई यानी 1,600 हेक्टेयर से वह हाथ धो चुका है । ◆जयपुर संभाग में तो भगवान शायद कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । यहां देवस्थान विभाग की 57.14 हेक्टेयर जमीन में से 56.56 हेक्टेयर पर कब्जे या अतिक्रमण हो चुके हैं. 5 मामले अदालत में विचाराधीन हैं । ◆कोटा संभाग में भी भगवान अपनी 'जमीन' से काफी हद तक विस्थापित हो चुके हैं । यहां विभाग के पास 1,320.3 हेक्टेयर जमीन थी । जिसमें से 941.31 हेक्टेयर पर कब्जेधारी अपने हक जमा चुके हैं । इन कब्जों के खिलाफ अदालत में 137 मामले चल रहे हैं । ◆अजमेर संभाग के हालात बहुत अलग नहीं हैं । यहां देवताओं के लिए देवस्थान विभाग के पास 1,900 बीघा जमीन थी, जिसमें से 1,697 बीघे को कब्जेधारी छीन चुके हैं । यहां मजे की बात यह है कि इतनी जमीन गंवा देने के बावजूद देवस्थान विभाग ने अदालत में कोई मामला दायर नहीं किया है । ◆बीकानेर संभाग में जरूर धोरों की जमीन भगवान के लिए सुरक्षा कवच बन गई है । कब्जे और अतिक्रमण के आदी लोगों ने इस इलाके में ईश्वरीय विस्थापन में बहुत दिलचस्पी नहीं ली । मंदिरों के नाम की 18,135.14 बीघा जमीन में से 549.13 बीघे पर ही अवैध कब्जे हुए हैं । इस संदर्भ में सात मामले अदालत में चल रहे हैं । एक गंगानगर जिले का और 6 चूरू जिले के है । ◆उदयपुर संभाग जो अपने यहां देवस्थान विभाग का मुख्यालय होने के बावजूद उदयपुर संभाग भी अपने यहां के मंदिरों की जमीन नहीं बचा पाया है। हालांकि कब्जा कम ही हुआ है । मंदिरों के नाम की 2,101 हेक्टेयर जमीन में से 197 हेक्टेयर छीनी जा चुकी है । इसके लिए अवैध कब्जेधारियों के खिलाफ 67 मामले अदालत में विचाराधीन हैं । मंदिरों की जमीन पर जिस तरह से कब्जों का सिलसिला चल रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भगवान की विदाई का आधे से ज्‍यादा काम हो चुका है । दबंग अतिक्रमणकारियों ने उन मंदिरों की जमीन को भी नहीं बख्शा, जहां हर साल लाखों की तादाद में दर्शनार्थी आते हैं । उदयपुर के ऋषभदेव जी को ही ले लें. यह हिंदुओं, आदिवासियों और जैन धर्म के लोगों की आस्था का केंद्र है । यहां प्रदेश ही नहीं, देशभर से लाखों दर्शनार्थी हर साल आते हैं जबकि दूसरी तरफ मंदिर परिसर पर कब्जे की लीला चल रही है. इस मंदिर के नाम 639.44. हेक्टेयर जमीन है, जिसमें से 259.56 पर कब्जे हो चुके हैं । इस जमीन को लेकर चार मामले अदालत में हैं । साफ है कि बड़े मंदिरों की जमीन को भी देवस्थान विभाग नहीं बचा पा रहा है । 【2】मन्दिरों पर भी कब्जा :- जयपुर शहर के बड़ी चौपड़ स्थित भगवान लक्ष्मीनारायण का मंदिर अतिक्रमणकारियों की चपेट में है । दौसा के महुआ स्थित सीतारामजी मंदिर, बूंदी जिले में कव्शवराय पाटन के भगवान कव्शवराय जी मंदिर और बारां जिले के भगवान कल्याराणराय की संपत्ति पर आज कब्जेधारियों की प्रतिमाएं लग चुकी हैं । चूरू के भगवान लक्ष्मीनारायणजी के बड़े मंदिर का मामला अदालत में है । ★देवस्थान विभाग मूक दर्शक व बेबस बना हुआ !★ खैर, बची जमीन की रखवाली तो देवस्थान महकमे को करनी ही है । लेकिन उसकी उदासीनता और स्टाफ की कमी ने कब्जेधारियों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि विभाग की कार्रवाई की भनक लगने पर वे पहले ही अदालत की ड्योढ़ी पर पहुंच जाते हैं । स्टाफ की कमी से जूझ रहा महकमा उसके बाद और भी कागजी कार्रवाइयों की उलझ्न में फंस जाता है । विभागीय उदासीनता का पूरा फायदा अवैध कब्जेधारियों को मिलता है क्योंकि सरकार ठीक से लड़ ही नहीं पाती । कहने को विभाग के पास निरीक्षकों के पद भी हैं लेकिन वे विभागीय और अदालती कामों में बुरी तरह उलझे हुए हैं । शहरी क्षेत्र की कीमती जमीन पर तो भूमाफियाओं की नजर लग चुकी है । ग्रामीण इलाकों में अवैध कब्जेधारियों और शहरी क्षेत्र में भूमाफियाओं तथा अतिक्रमणकारियों से देवस्थान को ज्‍यादा लड़ना पड़ रहा है । देवस्थान विभाग,राजस्थान केअधीन कुल 936 मंदिर हैं। इनमें से राजकीय प्रत्यक्ष प्रभार श्रेणी के 390, आत्मनिर्भर श्रेणी के 204 और सुपुर्दगी वाली श्रेणी के 342 हैं । पिछले दिनों महकमे की प्रदेश स्तर की एक बैठक में सुरक्षा संबंधी गंभीर मुद्दे उठे । सौ सुरक्षाकर्मियों की मांग उठी लेकिन राज्‍य सरकार ने महज 10 की ही मंजूरी दी । महकमे के कुल 688 पदों में से 173 आज भी खाली है. ऐसी लचर सुरक्षा व्यवस्था के बीच मंदिर के पुजारी भगवान के जेवर मंदिर के स्ट्रांग रूम में रखते हैं । ऐसे में इन कीमती गहनों की सुरक्षा का अंदाजा लगाया जा सकता है । बड़े मंदिरों के अलावा आज भी ऐसे करीब सौ मंदिर हैं, जिनकी सुरक्षा की जरूरत महसूस की गई है । मूर्तियों की चोरी, कीमती गहने चोरी, भगवान का छत्र चोरी, इस तरह की खबरें अक्सर छपती ही रही हैं । इस तरह की वारदातें बढ़ने के बावजूद पुलिस प्रशासन या फिर संबंधित महकमा कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है । कर्मचारियों मे आस्था, धार्मिक भावनाओं व कर्तव्य निष्ठा की कमी होने के कारण अतिक्रमण हो रहे है । जरूरत है देवस्थान महकमा कुंभकर्णी नींद से उठकर भक्त प्रह्लाद की तरह 24 घंटे चौकन्ना बैठे और अपनी संपति से जुड़ा हर मसला गंभीरता से ले । इससे कब्जेधारियों में कम से कम थोड़ा डर पनपेगा । राज्‍य सरकार को भी चाहिए कि वह थोड़ा करवट लेकर इस ओर ध्यान दे नहीं तो संकट में याद करने के लिए इष्टदेवों की चौखट भी नहीं बचेगी । सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी - एक बृजवासी 17/12/2020 #dineshapna www.dineshapna.blogspot.com


 

Tuesday, 15 December 2020

★सरकार का पक्षपाती नजरिया (धारा 26 से 31)★ ★धर्मनिरपेक्षता का बहाना - हिन्दू धर्म को प्रताडना★ 【यहाँ केवल संविधान की "दो धाराओ" को समझने के लिए "दस बिन्दु" दिये जा रहे है !】 (◆)संविधान की धारा 26 में दिए गए मौलिक अधिकार के अनुरूप परोपकारी कार्यो के लिए विविध प्रकार की संस्थाओं की स्थापना और संचालन करती है। (◆◆)संविधान की धारा 31[ए] के अंतर्गत धार्मिक संस्थाओं, न्यासों की संपत्ति का अधिग्रहण हो सकता है। (१) इस प्रसंग में गंभीर आपत्ति यह है कि संविधान की धारा 31[ए] का प्रयोग केवल हिंदू मंदिरों, न्यासों पर होता रहा है। किसी चर्च, मस्जिद या दरगाह की संपत्तिायां कितने भी घोटाले, विवाद या गड़बड़ी की शिकार हों, उन पर राज्याधिकारी हाथ नहीं डालते। (२) जबकि संविधान की धारा 26 से लेकर 31 तक, कहीं किसी विशेष रिलीजन या मजहब को छूट या विशेषाधिकार नहीं दिया गया है। (३) सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में भी किसी धार्मिक संस्था या रिलीजन की बात की गई है। मगर व्यवहारत: केवल हिंदू मंदिरों, न्यासों पर ही राज्य की वक्र-दृष्टि उठती रही है। (४) भारत में केवल हिंदू समुदाय है जिसे अपने धार्मिक-शैक्षिक-सांस्कृतिक संस्थान चलाने का वह निष्कंटक अधिकार नहीं, जो अन्य धर्मावलंबियों को है। यह बहुत बड़ा अन्याय है, जो सामान्य न्याय-बुद्धि ही नहीं, स्वयं संविधान की आत्मा के विरुद्ध है। (५) वस्तुत: संविधान की धारा 26 से लेकर 30 तक एक ऐसी विकृति की शिकार है, जिसकी हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक नहीं की थी। (६) संविधान निर्माताओं ने संविधान में समुदाय के रूप में अल्पसंख्यक शब्द का अलग से कई बार प्रयोग किया, जबकि बहुसंख्यक का एक बार भी नहीं। इसका अर्थ यह नहीं था कि वे कथित अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसे अधिकार देना चाहते थे, जो बहुसंख्यकों को न मिले। बल्कि वे सहज मानकर चल रहे थे कि बहुसंख्यकों को तो वे सभी अधिकार प्राप्त होंगे ही। अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के बराबर सभी अधिकार मिला रहे, इस नाम पर धारा 30 जैसे उपाय किए गए। धारा 30[2] को पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माताओं का यही भाव था। किंतु स्वतंत्र भारत में हिंदू-विरोधी नेताओं, बुद्धिजीवियों ने धीरे-धीरे, चतुराई से उन धाराओं का अर्थ यह कर दिया कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार हैं। यानी ऐसे अधिकार जो बहुसंख्यकों यानी हिंदुओं या हिंदी भाषियों को नहीं दिए जा सकते। उसी पक्षपात का व्यावहारिक रूप यह हो गया है कि धारा 26 से लेकर 30 तक की व्याख्या और उपयोग हिंदू समुदाय के धर्म और अधिकारों के प्रति निम्न भाव रखते किया जाता है। इसीलिए हिंदू मंदिरों, संस्थाओं और न्यासों को जब चाहे सरकारी कब्जे में ले लिया जाता है। इस पर कोई विचार नहीं होता कि हिंदुओं को अपने मंदिर, संस्थान और न्यास संचालित करने का वही मौलिक अधिकार क्यों नहीं है, जो दूसरों को है ? (७) यदि किसी मंदिर में विवाद या घोटाला हो, तो दोषी व्यक्तियों को न्यास के नियमों के अनुसार या कानूनी प्रक्रिया से कार्यमुक्त या दंडित किया जा सकता है । किंतु न्यास को भंग कर मंदिर या संस्थान पर राजकीय कब्जा करना हिंदुओं के विरुद्ध है। यह संविधान की धाराओं को हिंदू-विरोधी अर्थ दे देना है, जो न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। (८) यह तब और अन्यायपूर्ण प्रतीत होता है जब देखते हैं कि जहां-तहां अल्पसंख्यक संस्थानों, मस्जिदों, चर्चो के अवैध कार्यो में लिप्त होने की प्रमाणिक घटनाओं के बाद भी कभी राज्य द्वारा उन का अधिग्रहण नहीं किया जाता। केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल में मस्जिदों का आतंकवादियों द्वारा दुरुपयोग करने की प्रमाणिक घटनाएं हुई हैं। चर्च द्वारा माओवादियों और अलगाववादियों को सहयोग देने की खबरें भी कई स्थानों से आई हैं। क्या यह मस्जिद और चर्च प्रबंधन में गड़बड़ी नहीं ? तब कभी उनका अधिग्रहण क्यों नहीं होता ? (९) केवल रामकृष्ण आश्रम, काशी विश्वनाथ या शिरडी साईं मंदिर जैसी हिंदू संस्थाओं पर ही राजकीय नियंत्रण की तलवार क्यों लटकाई गई ? दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं, कि वहां अल्पसंख्यकों को वैसे अधिकार हों, जो बहुसंख्यकों को न हो। मगर भारत में यही चल रहा है। (१०) यह हिंदुओं की दुर्बलता, भीरुता और विखंडन का प्रमाण तो है ही, कथित हिंदूवादी संगठनों के निक्केमपन का भी चमकता इश्तिहार है। वे 【◆समान नागरिक संहिता◆】 पर शोर-शराबा करते रहे हैं, जो न उतना महत्वपूर्ण है, न आसान, क्योंकि उसमें मुस्लिम समुदाय का विशेषाधिकार छिनेगा। किंतु 【◆धारा 26 से 31 को हिंदुओं के लिए बराबर रूप से लागू◆】 करने में दूसरे किसी समुदाय का कुछ नहीं जाएगा, क्योंकि इससे हिंदुओं को भी वह मिलेगा जो दूसरों को मिला हुआ है। मगर भारत में हिंदू हितों की बात तक करना गलत समझा जाता है। यह यहां की अधिकांश राजनीतिक बीमारियों और सामाजिक विकृतियों की जड़ है। इसे समय रहते समझा जाना चाहिए। सीए. दिनेश सनाढ्य - एक हिन्दुस्तानी - एक बृजवासी 15/12/2020 #dineshapna







 

★★ सेकुलरिज्म क्या है? ★★ एक मुस्लिम बच्चे ने अपनी माँ से पूछा *"अम्मी, ये सेकुलरिज्म (धर्म निरपेक्षता) क्या होता है?"* *बुर्के में लिपटी महिला ने अपने बेटे को बताया,* "बेटे, सेकुलरिज्म इस देश का वह सिस्टम है जिसमें हिन्दू करदाता जीतोड़ मेहनत कर सरकार को इतना टैक्स चुकाता है जिससे कि हम जैसे *अल्पसंख्यकों* को फ्री आवास, मदरसों में फ्री शिक्षा, फ्री मेडिकल ट्रीटमेंट आदि सुविधाएँ मिलती रहें! मंदिरों की हुंडियों का धन हमारे लिए प्रयोग किया जा सके किन्तु मस्जिदों में क्या हो रहा है, उस तरफ कोई आँख उठाकर देखने की भी हिम्मत ना कर सके! हमें कानून का संरक्षण तो मिले किन्तु कोई कानून हम पर लागू नहीं हो! *इस प्रकार के जन्नतनुमा माहौल को ही सेकुलरिज्म कहते हैं!!!"* *“लेकिन अम्मी, इससे हिन्दू करदाता नाराज नहीं होते?" बच्चे ने पूछा।* *"होते हैं बेटा,* किन्तु उनके गुस्से को कुंद करने के लिए हम उनको *साम्प्रदायिक* बताना शुरू कर देते हैं, ताकि उनको शर्मिंदगी महसूस हो! इस तरह कुछेक अड़ियल हिंदुओं को छोड़कर, बाक़ी सभी हिन्दू इस सेकुलरता नाम के जहर को प्रसाद समझ कर ना केवल ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार कर लेते हैं बल्कि उन्हें अपने आपको सेक्युलर कहलवाने में गर्व भी महसूस होता है, तथा वह अपने आपको सेक्युलर सिद्ध करने के प्रयास में हमारे सब कर्मों का आँख मूंदकर समर्थन करते हैं!" बच्चे ने कहा, *इसका मतलब हिन्दू तो बहुत अच्छे हैं!* बुर्के वाली महिला ने कहा, *अच्छे नहीं बेवकूफ हैं,* जो अपना हक छोड़कर हमारे बोझ को उठाते हैं! बच्चे ने अपनी समझ से कहा, लेकिन अम्मी हमें अल्पसंख्यक कहते हैं, सुनने में अच्छा नहीं लगता! महिला ने कहा, तू चिंता मत कर बेटे, इसी सेक्युलरिज्म की बदौलत हम बहूसंख्यक हो जाएँगे, हमारे लिए कोई रोकटोक नहीं, जितना भी पैदा करो, और एक दिन हिन्दुस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में राज करेंगे! मैंने तेरे 31 भाई बहन यूँ ही थोड़े न पैदा किए हैं!!! *बच्चे ने कहा,* हाँ अम्मी मैं समझ गया, जब हिन्दू बोझ उठाते हैं *तो पैदा करने में क्या दिक्कत है!!!* ☝ *सेकुलरिज्म को इससे आसान शब्दों में आज तक किसी ने नहीं समझाया होगा!*🙏🙏


 

Monday, 14 December 2020

★★भारत में 4 लाख हिन्दू मंदिरों पर राजकीय कब्जा, चर्च व मस्जिद पर नहीं !★★ ●●●●●●●(भाग 1)●●●●●●● डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के मुख्य निर्माता थे। यह उन्हीं का कथन है कि हमारा संविधान सेक्यूलर नहीं क्योंकि “यह विभिन्न समुदायों के बीच भेद-भाव करता है।” यह तब की बात है, जब संविधान की प्रस्तावना में छेड़-छाड़ नहीं हुई थी। बाद में तो संविधान में ‘सेक्यूलर’ शब्द जोड़ कर और भी घात किया गया, जिसे संविधान निर्माताओं ने विचार करके खारिज किया था। वे इस अवधारणा से बखूबी परिचित थे, इसलिए उसे यहाँ अनुचित समझा। मगर कैसी (◆१◆) विडंबना कि 1976 ई. में एक नेहरूवादी-कम्युनिस्ट चौकड़ी ने इस शब्द को संविधान में प्रवेश करा दिया। फिर जो दूसरे जातिवादी-राष्ट्रवादी आए, उन्होंने भी 1978 ई. में इस की पुष्टि कर दी। मगर दूसरी (◆२◆) विडंबना उस से कम नहीं। जब संविधान को ‘सेक्यूलर’ घोषित कर दिया गया, उस के बाद से नीति-निर्माण को निरंतर हिन्दू-विरोधी रुझान दे दिया गया। अर्थात् सेक्यूलरिज्म अपने यूरोपीय अर्थ सभी धर्मों से दूरी या समानता नहीं, बल्कि एक हिन्दू-विरोधी प्रवृत्ति, नीति सी बन गई। चूँकि सभी दलों ने इसे समर्थन दे दिया, इसलिए वह बदस्तूर चल रहा है। यद्यपि कई नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और न्यायविद् इस अन्याय को महसूस करते हैं। मगर कोई कुछ नहीं करते। यह एक तीसरी (◆३◆) विडंबना है। क्योंकि यह सब मुख्यतः हिन्दू परिवारों में जन्मे कर्णधारों, विद्वानों और न्यायाधीशों द्वारा होता हैं। इन सारी गड़बड़ियों में जो बातें सब से आश्चर्यजनक लगती है, उन में हिन्दू मंदिरों पर सरकारी कब्जा सब से ऊपर है। विशेषकर हिन्दूवादी कहलाने वाले संघ-परिवार के शासनों में भी यह जारी रहना! वह भी तब, जब सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ-साफ कहा है कि ‘‘मंदिरों का संचालन और व्यवस्था भक्तों का काम है, सरकार का नहीं।’’ (8 अप्रैल 2019)। सुप्रीम कोर्ट हिन्दू मंदिरों पर सरकारी कब्जे को कई बार अनुचित कह चुकी है। उस ने चिदंबरम के प्रसिद्ध नटराज मंदिर को सरकारी कब्जे से मुक्त करने का आदेश 2014 ई. में दिया था। इस के अलावा भी दो वैसे फैसले आ चुके हैं। फिर भी, जहाँ-तहाँ विभिन्न राज्य सरकारें हिन्दू मंदिरों पर कब्जा बनाए हुए हैं। इस के विपरीत, किसी चर्च अथवा मस्जिद को सरकार कभी नहीं छूती। क्या इस से बड़ा धार्मिक अन्याय और संविधान में मौजूद ‘नागरिक समानता’ का मजाक संभव है? जो दलीलें हिन्दू मंदिरों पर सरकारी कब्जा रखने के पक्ष में दी जाती हैं, वह सब मस्जिदों, चर्चों पर भी लागू हैं। किन्तु केवल हिन्दू मंदिरों पर कब्जा है, शेष सभी समुदाय अपने-अपने धर्म-स्थान स्वयं चलाने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं! आश्चर्य का दूसरा पहलू यह है कि स्वयं भाजपा समर्थक बौद्धिक मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं! स्वयं डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे महारथी एक भाजपा शासित राज्य में हाल में मंदिरों पर नया सरकारी कब्जा करने के विरुद्ध लड़ रहे हैं। मगर सत्ताधीशों द्वारा कोई सुनवाई नहीं। जब कि हिन्दू मंदिरों को मुक्त करने में न कोई कानून बनाना है, न कोई बजट प्रावधान करना है, न कोई विरोध-आंदोलन झेलने का डर है। गत वर्ष पुरी के जगन्नाथ मंदिर मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोबड़े ने कहा, “मैं नहीं समझ पाता कि सरकारी अफसरों को क्यों मंदिर का संचालन करना चाहिए?” उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण भी दिया कि सरकारी नियंत्रण के दौरान अनमोल देव-मूर्तियों की चोरी की अनेक घटनाएं भी होती रही हैं। कारण यही है कि भक्तों के पास देवमूर्तियों की रक्षा का अधिकार ही नहीं है! जिन्होंने वह अधिकार ले लिया है, वे उसी तरह बेपरवाह काम करते हैं जैसे सरकारी विभाग। यही नहीं, वे धार्मिक गतिविधियों, रीतियों में भी हस्तक्षेप करते हैं। कई बार अनजाने, तो कई बार जान-बूझ कर भी। सरकारी अफसरो को तो मात्र नागरिक शासन चलाने की ट्रेनिंग मिली है। इसलिए कोई अफसर अपने वैचारिक पूर्वग्रह, अज्ञान या मतवादी कारणों से हिन्दू रीतियों के प्रति उदासीनया या दुराग्रह भी दिखा सकता है। अभी देश भर में 4 लाख से अधिक मंदिरों पर सरकारी कब्जा है। एक भी चर्च या मस्जिद पर नहीं। अकेले आंध्र प्रदेश में 34 हजार मंदिर सरकारी कब्जे में हैं। कम से कम 15 राज्य सरकारें उन लाखों मंदिरों पर नियंत्रण रखती हैं। मंदिरों के प्रशासक नियुक्त करती है। वे जैसे ठीक समझें व्यवस्था चलाते हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार अलग। इस बीच, जैसा सरकारी विभागों में प्रायः होता है, मंदिरों के कोष और संपत्ति के मनमाने उपयोग, दुरूपयोग के समाचार आते रहते हैं। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सत्ताधारी बहुत पहले से मंदिरों की आय का उपयोग ‘अल्पसंख्यक’ समुदायों को विविध सहायता देने में करते रहे हैं। यह निस्संदेह हिन्दू-विरोधी कार्य भी है। सर्वविदित है कि कुछ बाहरी धर्म हिन्दू धर्म पर प्रहार करते रहे हैं, छल-बल से हिन्दुओं का धर्मांतरण कराते रहे हैं, अपने दबदबे के इलाकों में उन्हें मारते-भगाते रहे हैं। उन्हीं समुदायों को हिन्दू मंदिरों की आय से सहायता देना सीधे-सीधे हिन्दू धर्म को चोट पहुचाने के लिए ही सहायता देना है! इस बीच, राजकीय कब्जे वाले हिन्दू मंदिरों के पुजारी मूक दर्शक बना दिए गए हैं। उन्हें अपने ही मंदिरों की देख-रख से वंचित या बाधित कर दिय़ा गया। वे मंदिरों के पारंपरिक शैक्षिक, कला, संस्कृति या सेवा संबंधी कार्य नहीं कर सकते जो अंग्रेजों के शासन से पहले तक होते रहे थे। जैसे, पाठशालाएं, वेदशालाएं, गौशालाएं, चिकित्सालय अथवा शास्त्रीय नृत्य आयोजन, आदि। इस प्रकार, हिन्दू मंदिर के पुजारियों की तुलना में किसी मस्जिद के ईमाम या चर्च के बिशप की सामाजिक स्थिति और मजबूत होती है। वे अपने समुदाय को समर्थ, सबल बनाने के लिए मस्जिद और चर्च का बाकायदा इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र रहते हैं। यह भी तुलनात्मक रूप से हिन्दुओं की एक गंभीर हानि है, जिसे हिसाब में लेना चाहिए। विशेषकर भारत में यह हानि अब अधिक खतरनाक है। अभी कुछ सत्ताधारी कोरोना-संकट में धन की कमी को मंदिरों में मौजूद सोना से पूरा करने की योजना बना रहे हैं या बना चुके हैं। हाल में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इस की खुली माँग की। कई बार मंदिरों में जमा सोने को सरकार दबाव देकर जबरन रूपयों में बदलवाती है, ताकि उस पैसे का उपयोग कर सके। इस बीच, सोने को रूपये में बदल लेने से आगे जो घाटा होगा वह अलग। यह सब हिन्दू धर्म-समाज के विरुद्ध अनुचित, पक्षपाती जबरदस्ती है। जो इसीलिए चल रही है क्योंकि मंदिरों पर सरकारी कब्जा है। वे किसी मस्जिद या चर्च की संपत्ति से राजकीय कोष की जरूरत पूरी करने की नहीं सोचते। मंदिरों में भक्तों द्वारा चढ़ाया गया धन सरकार द्वारा लेना संविधान के अनुच्छेद 25-26 का भी उल्लंघन है। पर कौन क्या करे, जब बाड़ ही खेत को खाने लगे! फिर, सरकारी कब्जे के कारण मंदिरों से 13 - 18 प्रतिशत अनिवार्य सर्विस-टैक्स वसूला जाता है। यह भी मस्जिदों या चर्चों से नहीं वसूला जाता। कई मंदिरों में ‘ऑडिट फीस’, ‘प्रशासन चलाने’ की फीस, इन्कम टैक्स, और दूसरे तरह के टैक्स भी लगाए जाते हैं! जबकि उन्हीं मंदिरों में वेद-पाठ करने वालों, अर्चकों, आदि को जो पारंपरिक दक्षिणा आदि मिलती थी, वह नहीं मिलती या नगण्य़ मिलती है। किसी-किसी मंदिर की आय का लगभग 65 - 70 प्रतिशत तक विविध मदो में सरकार हथिया लेती है। जैसे, पलानी (तमिलनाडु) के दंडयुतपाणि स्वामी मंदिर में। (जारी......................)



 

माना कि औरो के मुकाबले, कुछ ज्यादा पाया नहीं मैंने ! पर खुश हूँ कि स्वयं को, गिराकर कुछ उठाया नहीं मैंने ! कुछ खास जादू नहीं है मेरे पास.... - बस बात दिल से करता हूँ.... - बस सोच ईमानदारी की रखता हूँ.... - बस काम आम आदमी के लिए करता हूँ.... कभी यह मत सोचो कि आप अकेले हो, बल्कि यह सोचो कि आप अकेले ही काफी हो ! CA. Dinesh Chandra Sanadhya Chartered Accountant, Social Activist, Political Analyst, Spiritual Thinker, Founder of Life Management.