Saturday, 23 May 2026

★ *पर्यावरण की बातें बड़ी-बड़ी,* *धरातल पर कार्य बहुत कम* ★ पर्यावरण की बातें बड़ी-बड़ी, मंचों पर भाषण, नारों की लड़ी। धरती माँ फिर भी पूछ रही— "मेरे घावों की मरहम कहाँ पड़ी?" पेड़ लगाने के उत्सव होते, फोटो खिंचते, समाचार छपते। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद, वो पौधे पानी को तरसते। नन्हे अंकुर सूख के गिरते, कोई उनकी सुध न लेता। कर्तव्य केवल रोपण तक सीमित, पालन का धर्म कौन निभाता? पेड़ लगाने पर जोर बहुत है, पर कटाई पर रोक कहाँ? हरियाली का वचन सभी देते, पर संरक्षण का संकल्प कहाँ? एक ओर वृक्षारोपण अभियान, दूजी ओर जंगलों का संहार। काग़ज़ों में हरियाली बढ़ती, धरती पर बढ़ता अंधकार। प्लास्टिक थैलियों पर प्रतिबंध है, यह शासन का उत्तम आदेश। पर उनकी फैक्ट्रियाँ चलती रहें, तो कैसा होगा यह परिवेश? बाज़ारों में ढेरों प्लास्टिक, नदियों में बहता उसका विष। मूक पशु खाते हैं उसको, और भुगतते जीवन का क्लेश। संविधान भी कहता हमसे— अनुच्छेद 48(क) का यही विधान, "राज्य करे पर्यावरण रक्षा," हरियाली का हो सम्मान। अनुच्छेद 51(क)(g) पुकारे, हर नागरिक का यह कर्तव्य बने— "वन, जल, जीवों की रक्षा कर," धरती फिर से स्वर्ग सजे। केवल कानून बनाने से, कर्तव्य कभी पूरे न होंगे। जब तक मन में प्रेम न जागे, वन फिर हरे-भरे न होंगे। पेड़ लगाना केवल प्रारम्भ है, उनकी सेवा ही सच्चा धर्म। जल दो, रक्षा करो, प्रेम दो, यही प्रकृति पूजा का मर्म। आओ अब संकल्प करें हम— नारे नहीं, व्यवहार बदलें। धरती माँ की पीड़ा समझें, अपने जीवन के आधार बदलें। यदि वृक्ष रहेंगे, जल बचेगा, तो ही जीवन मुस्काएगा। यदि प्रकृति का मान रखेंगे, तो भारत फिर हरियाएगा। पर्यावरण की बातें बड़ी-बड़ी, अब धरातल पर काम भी हो। केवल शब्दों से नहीं मित्रों, कर्तव्य से हर नाम भी हो॥ *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* *#एक हिन्दुस्तानी* (121) #24/05/2026 #dineshapna


 

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