Wednesday, 28 October 2026

■ *युगों के साथ बदलते धर्म और युद्ध के सिद्धांत* ■ ( काल चक्र के साथ धर्म का पतन और युद्ध जीतने के तौर-तरीके आदर्शवाद से व्यावहारिक यथार्थ की ओर बढ़ते चले गए। ) *(1) सत्ययुग में* धर्म अपने पूरे स्वरूप में यानी *चारों चरणों पर* प्रतिष्ठित था। उस काल में छल-कपट का कोई स्थान नहीं था; युद्ध केवल तपोबल, सत्य और आध्यात्मिक तेज से जीते जाते थे, जहाँ शारीरिक बल से अधिक महत्व आत्मबल का था। *(2) त्रेतायुग में* धर्म घटकर *तीन चरणों पर* रह गया और व्यवस्था की रक्षा के लिए मर्यादा का महत्व बढ़ा। इस युग में श्रीराम ने कठोर युद्ध-नियमों और नैतिकता के भीतर रहकर विजय प्राप्त की। यहाँ जीत का आधार अधर्म का मुकाबला धर्म और आचार संहिता का पालन करते हुए करना था। *(3) द्वापरयुग में* यहाँ तक आते-आते धर्म केवल *दो चरणों पर* सिमट गया और अधर्म अत्यंत संगठित हो गया। ऐसे में केवल नियमों में बंधे रहने से धर्म की रक्षा असंभव थी। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कूटनीति और व्यावहारिक धर्म की राह दिखाई, जहाँ उच्चतर धर्म की रक्षा के लिए युद्ध के पारंपरिक नियमों को गौण मानकर रणनीति से विजय हासिल की गई। *(4) कलयुग में* धर्म केवल *एक चरण पर* टिका है और युद्ध किसी बाहरी मैदान के बजाय मनुष्य के भीतर मानसिक और वैचारिक स्तर पर लड़ा जा रहा है। यहाँ न कोई निश्चित नियम हैं और न कोई स्पष्ट सीमा। इस युग में वही व्यक्ति विजयी है जो प्रलोभन, क्रोध और भ्रम से परे रहकर आत्म-नियंत्रण, बुद्धि और विवेक से अपने आंतरिक द्वंद्व को जीतता है। संक्षेप में ---- *जीत का आधार सत्ययुग में तप, त्रेता में मर्यादा, द्वापर में कूटनीति और कलयुग में आत्म-विवेक रहा है।* *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (345) #एक_हिन्दुस्तानी #28/10/2026 #dineshapna









 

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