Tuesday, 27 October 2026

■ *चारों युगों में धर्म की स्थिति और युद्ध जीतने के सिद्धांतों में क्रमिक बदलाव* ■ [1, 2] (युद्ध के नियम और जीतने की रणनीतियाँ भी आदर्शवाद से व्यवहारवाद (Pragmatism) की ओर बढ़ती चली गईं।) *(1.) सत्ययुग: तपोबल और पूर्ण सत्य का युग* *धर्म की स्थिति:* धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, तप, पवित्रता, दान) पर पूरी तरह प्रतिष्ठित था। *युद्ध का स्वरूप व सिद्धांत:* ■ युद्ध छल से नहीं, केवल तपस्या, आत्मबल और मंत्रबल से लड़े जाते थे। ■ शारीरिक हिंसा से अधिक महत्व मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति का था। ■ कोई कूटनीति या छल-कपट नहीं था; जो सत्य और कठोर तप पर अडिग रहा, जीत उसी की मानी जाती थी। *(2.) त्रेतायुग: मर्यादा और आचार संहिता का युग* *धर्म की स्थिति:* धर्म तीन चरणों पर टिका था (पवित्रता, तप और दान); समाज में मर्यादा और नियमों का अत्यधिक महत्व था। *युद्ध का स्वरूप व सिद्धांत:* ■ युद्ध के कठोर नियम थे—सूर्यास्त के बाद युद्ध बंद, निहत्थे या भागते हुए शत्रु पर प्रहार न करना। ■ श्रीराम ने मर्यादा और स्थापित नियमों के भीतर रहकर युद्ध जीता। ■ रावण जैसे महाबली शत्रु के सामने भी अधर्म का सहारा नहीं लिया गया; जीत का आधार बना नैतिक बल, धैर्य और सत्यनिष्ठा। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (343) #एक_हिन्दुस्तानी #27/10/2026 #dineshapna



 

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