Chartered Accountant,Social Activist,Political Analysist-AAP,Spritual Thinker,Founder of Life Management, From India, Since 1987.
Tuesday, 27 October 2026
■ *चारों युगों में धर्म की स्थिति और युद्ध जीतने के सिद्धांतों में क्रमिक बदलाव* ■ [3, 4] (युद्ध के नियम और जीतने की रणनीतियाँ भी आदर्शवाद से व्यवहारवाद (Pragmatism) की ओर बढ़ती चली गईं।) *(3.) द्वापरयुग: कूटनीति और व्यावहारिक धर्म का युग* *धर्म की स्थिति:* धर्म घटकर केवल दो चरणों (पवित्रता और दान) पर रह गया था; अधर्म अत्यंत संगठित और शक्तिशाली हो चुका था। *युद्ध का स्वरूप व सिद्धांत:* ■ जब सामने खड़ा शत्रु (कौरव) सारे नियम पहले ही तोड़ चुका हो, तो केवल नियमों में बंधकर धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। ■ भगवान श्रीकृष्ण ने स्थापित किया कि "धर्म की रक्षा के लिए नियमों का टूटना, नियमों के पालन में धर्म के नष्ट होने से कहीं बेहतर है।" ■ भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन के वध में रणनीति और कूटनीति का उपयोग किया गया। जीत का सिद्धांत बना—'परिणाम में धर्म की विजय' (व्यावहारिक धर्म)। *(4.) कलयुग: आत्म-नियंत्रण और बौद्धिक द्वंद्व का युग* *धर्म की स्थिति:* धर्म केवल एक चरण (दान/सहानुभूति) पर लड़खड़ा रहा है; कपट, छल और भ्रम अपने चरम पर हैं। *युद्ध का स्वरूप व सिद्धांत:* ■ यहाँ कोई मैदान नहीं है, न कोई स्पष्ट नियम बचे हैं। आज का युद्ध मनोवैज्ञानिक, वैचारिक और आंतरिक है। ■ इस युग में बाहुबल से जीत नहीं मिलती; जीत विवेक, धैर्य और आत्म-जागरूकता से मिलती है। ■ सिद्धांत सीधा है—जो व्यक्ति अपने मन के भ्रम, प्रलोभन और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कर लेता है, वही इस युग का असली विजेता है। *सत्ययुग में जीत तप से, त्रेता में मर्यादा से, द्वापर में कूटनीति से और कलयुग में केवल आत्म-विवेक से ही संभव है।* *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* • Chartered Accountant • Social Activist • Political Analyst • Spiritual Thinker • Founder of Life Management (344) #एक_हिन्दुस्तानी #28/10/2026 #dineshapna
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