Chartered Accountant,Social Activist,Political Analysist-AAP,Spritual Thinker,Founder of Life Management, From India, Since 1987.
Monday, 27 July 2026
★ *युगों के अनुसार धर्म रक्षा की कार्यशैली* ★ एक दार्शनिक दृष्टि से युगों का परिवर्तन मानव समाज की परिस्थितियों में परिवर्तन का भी संकेत देता है। - *सत्ययुग में* ऐसा प्रतीकात्मक रूप से माना जा सकता है कि देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग थीं। - *त्रेतायुग में* दोनों का सामना एक ही संसार में हुआ। - *द्वापरयुग में* एक ही परिवार के भीतर भी धर्म और अधर्म का संघर्ष दिखाई देता है। - *कलियुग में* सबसे बड़ा संघर्ष मनुष्य के अपने अंतःकरण में है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दैवी और आसुरी—दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों का संघर्ष चलता रहता है। इसी कारण *प्रत्येक युग की परिस्थितियाँ भिन्न रहीं।* परिस्थितियाँ बदलीं *तो धर्म की रक्षा के लिए अपनाई जाने वाली कार्यशैली, नीति और व्यवहार में भी परिवर्तन हुआ।* किन्तु *धर्म का मूल उद्देश्य—सत्य, न्याय, करुणा और लोककल्याण—कभी नहीं बदला।* भगवान श्रीराम ने *त्रेतायुग* की परिस्थितियों के अनुसार *मर्यादा, त्याग और आदर्श आचरण का मार्ग दिखाया।* भगवान श्रीकृष्ण ने *द्वापरयुग* की जटिल परिस्थितियों में *विवेक, निष्काम कर्म, रणनीति और धर्मरक्षा का मार्ग बताया।* *कलियुग में* भी धर्म की रक्षा का अर्थ है— *सत्य, न्याय, संविधान और विधि का सम्मान करते हुए विवेक, संगठन, शिक्षा, तकनीक और उचित नीति के साथ अधर्म का सामना करना।* *भगवान एक ही हैं, धर्म का मूल भी एक ही है*; बदलती हैं तो केवल परिस्थितियाँ, और उन्हीं के अनुरूप धर्माचरण की कार्यपद्धति एवं नीति। *सीए दिनेश चन्द्र सनाढ्य* (201) #एक_हिन्दुस्तानी #28/07/2026 #dineshapna
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